देहरादून: देशभर में एसआईआर को लेकर सवाल उठ रहे हैं. इसी क्रम में विपक्षी दल स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रोसेस में कथित गड़बड़ियों और चीफ इलेक्शन कमिश्नर (CEC) ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर मुखर हैं. दरअसल, मंगलवार को विपक्षी सांसदों ने दिल्ली में मार्च निकाला है. विपक्षी सांसदों ने संसद भवन परिसर में एकत्र होकर नारेबाजी की और फिर निर्वाचन आयोग मुख्यालय की ओर प्रस्तावित मार्च के लिए निकले. देश की राजधानी दिल्ली के संसद मार्ग पर हो रहे प्रदर्शन के सवाल पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि ज्ञानेश कुमार पिछले साल ही चीफ इलेक्शन कमिश्नर बने हैं, लेकिन उससे पहले से ही एनडीए चुनाव जीत रही है.
देश के जिन राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया संपन्न हुई है, उन राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया पर नेताओं ने सवाल उठाए हैं. उत्तराखंड राज्य में भी हाल ही में एसआईआर की प्रक्रिया संपन्न हुई है, लेकिन फिर के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के नाम काटे जाने के मामले को लेकर विपक्षी दल कांग्रेस ने प्रदेश में जमकर हंगामा काटा. लिहाजा, दिल्ली में एसआईआर को लेकर लगातार हो रहे प्रदर्शन से मामला और अधिक गंभीर होता जा रहा है. क्योंकि संसद के मुख्य विपक्षी दल चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को प्रोटेस्ट कर रहे हैं.
दिल्ली के संसद मार्ग पर चल रहे प्रोटेस्ट को देखते हुए आज सुबह से ही सेंट्रल दिल्ली में सिक्योरिटी बढ़ा दी गई थी. विपक्ष ने वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों और चुनाव आयोग से ज्यादा पारदर्शी की मांग को लेकर मार्च निकाला है. इस पूरे मामले पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि फरवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त निर्वाचित किया गया है. लेकिन उससे पहले भी भाजपा- एनडीए हर जगह चुनाव जीत रही थी. ऐसे में कांग्रेस के पास कोई मुद्दा नहीं है.
क्योंकि एसआईआर देश में पहली बार नहीं हो रहा है बल्कि इससे पहले भी 20 बार एसआईआर हो चुका है. लेकिन इससे पहले कभी आपत्ति नहीं हुई. ऐसे में पहली बार जैसा एसआईआर होना चाहिए वो एसआईआर हो रहा है. ऐसे में सवाल यही है कि जो घुसपैठिए हैं क्या उनको मतदान का अधिकार मिलना चाहिए, जिन लोगों का नाम कई राज्यों में है क्या उन लोगों को वोट का अधिकार होना चाहिए? ऐसे में गलत चीजों को रोकने के लिए और मतदाता सूची के शुद्धिकरण के लिए ये यह प्रक्रिया चल रही है तो उसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए.
अगर इससे किसी को आपत्ति हो रही है तो उससे स्पष्ट है कि दाल में कुछ काला है, क्योंकि इन लोगों के सहारे चुनाव को कहीं ना कहीं प्रभावित करते आए हैं. कुल मिलाकर देश संविधान, विधि और व्यवस्था के आधार पर चलेगा, न कि हुड़दंगबाजी और माहौल खराब करने से चलेगा. साथ ही कहा कि कभी ईवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ते हैं. लेकिन जब उसी ईवीएम से चुनाव जीतते हैं, तब वो ईवीएम अच्छी हो जाती है.
इसके अलावा, विपक्ष कभी प्रशासनिक मशीनरी तो कभी चुनाव आयोग पर प्रश्नचिन्ह खड़े करते हैं. कोई भी ऐसी संवैधानिक संस्थाएं नहीं है, जिस पर विपक्ष उंगली ना उठाता हो. ऐसे में पूरा देश देख रहा है कि ये विरोध सिर्फ एक बहाना है, उसके पीछे का मकसद यही है कि जो सही ढंग से काम चल रहा है वो उनको पसंद नहीं आ रहा है. क्योंकि उनकी जो मंशा है चुनाव को प्रभावित करने का उसमें सफल नहीं हो पा रहे हैं.