नैनीताल: ‘यदि पेशेवर ड्राइवर किसी दुर्घटना के कारण वाहन चलाने के लिए पूरी तरह से अयोग्य हो जाता है, तो उसकी कमाने की क्षमता में गिरावट को 100 फीसदी माना जाना चाहिए.’ यह निर्णय नैनीताल हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में सुनाया.
दरअसल, न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी की एकल पीठ ने ‘भूपेंद्र सिंह रावत बनाम रवींद्र प्रकाश पंत’ मामले में यह निर्णय सुनाया. अदालत ने वर्कमैन कंपनसेशन कमिश्नर/जिला मजिस्ट्रेट पिथौरागढ़ के उस पुराने आदेश को संशोधित कर दिया, जिसमें अपीलकर्ता की विकलांगता 75 फीसदी होने के आधार पर मुआवजे की गणना केवल 60 फीसदी कमाने की क्षमता के नुकसान पर की गई थी.
क्या है मामला? बता दें कि भूपेंद्र सिंह रावत साल 2009 से एक वाहन चालक के रूप में कार्यरत थे. बीती 8 मार्च 2010 को मुनस्यारी में वाहन चलाते समय वो एक गंभीर दुर्घटना का शिकार हो गए. जिसमें उन्हें कई फ्रैक्चर हुए और मेडिकल बोर्ड ने उन्हें 75 फीसदी स्थायी विकलांगता का प्रमाण पत्र जारी कर दिया.
नैनीताल हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न कानूनी सिद्धांतों और ‘बीरेन्द्र कुमार’ मामले के उदाहरणों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब कोई व्यक्ति अपनी शारीरिक अक्षमता के कारण अपना मूल पेशा (ड्राइविंग) करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है और उसका ड्राइविंग लाइसेंस भी रिन्यू नहीं हो सकता, तो भले ही उसकी शारीरिक विकलांगता 75 फीसदी हो, लेकिन उसकी अर्जन क्षमता का नुकसान शत प्रतिशत (100%) ही माना जाएगा.
न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार करते हुए मुआवजे की राशि को 2,39,457 रुपए से बढ़ाकर 3,99,096 रुपए करने का आदेश दिया. इसके साथ ही अदालत ने ब्याज दरों में भी सुधार किया. निचले प्राधिकरण की ओर से दिए गए 8 फीसदी ब्याज को कर्मचारी मुआवजा अधिनियम 1923 की धारा 4-A(3) के प्रावधानों के विपरीत बताते हुए न्यायालय ने आदेश दिया कि दावेदार दुर्घटना की तारीख से एक महीने बाद यानी 7 अप्रैल 2010 से पूरी मुआवजा राशि पर 12 फीसदी प्रति वर्ष की दर से ब्याज पाने का हकदार है.