रामनगर: जनप्रतिनिधियों द्वारा विकास के दावे भी खूब किए जाते हैं, लेकिन हकीकत आज भी पहाड़ों में कहीं न कहीं दम तोड़ती नजर आती है. तस्वीर उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामनगर क्षेत्र के रामपुर की है, जहां आज भी लोग अपनी जान हथेली पर रखकर रोजाना आवाजाही करने को मजबूर हैं. रामनगर से महज 27 किलोमीटर दूर पाटकोट गांव और उससे करीब 2-3 किलोमीटर आगे रामपुर गांव यहां करीब 800 ग्रामीणों की जिंदगी एक जर्जर लकड़ी के पुल पर टिकी है. ये पुल कालीगाड़ नदी के ऊपर बना है. जिसे ग्रामीण हर साल बरसात के बाद खुद ही मरम्मत कर तैयार करते हैं.
जैसे ही बारिश का मौसम आता है, ये नदी उफान पर आ जाती है और ये लकड़ी का पुल किसी बड़े खतरे की तरह सामने खड़ा हो जाता है. लेकिन मजबूरी ऐसी कि ग्रामीणों को इसी पुल से रोज गुजरना पड़ता है. सबसे ज्यादा खतरा उन बच्चों को है जो रोजाना इसी रास्ते से होकर राजकीय इंटर कॉलेज पाटकोट पढ़ने जाते हैं करीब 50 से 55 बच्चे हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर इस पुल को पार करते हैं.
ग्रामीण महेश चंद्र का कहना है हमारे बच्चों को रोज इसी पुल से जाना पड़ता है डर लगा रहता है कि कहीं कोई हादसा न हो जाए. सिर्फ पढ़ाई ही नहीं बल्कि रोजमर्रा की जरूरतें भी इस खतरे से होकर गुजरती हैं. राशन की दुकान पाटकोट में है, ऐसे में ग्रामीणों को भारी सामान सिर पर रखकर इसी पुल से पार करना पड़ता है. इतना ही नहीं जब कोई बीमार पड़ता है तो उसे अस्पताल ले जाने के लिए भी इसी जर्जर पुल का सहारा लेना पड़ता है. कई बार हालात इतने खराब हो जाते हैं कि जान पर बन आती है. ग्रामीण बताते हैं कि अब तक दो बार बाइक सवार इस नदी को पार करते वक्त बह चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात जस के तस हैं.