रामनगर: उत्तराखंड समेत तराई-कुमाऊं क्षेत्र में लगातार सामने आ रही मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है. खासतौर पर शीत ऋतु के दौरान बाघ और गुलदार के हमलों की घटनाओं में इजाफा देखा जा रहा है. इस विषय पर वन्यजीव विशेषज्ञ संजय छिम्वाल और कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने अहम बातें साझा की हैं. वन्यजीव विशेषज्ञ संजय छिम्वाल ने कहा कि यह घटनाएं बेहद दुखद हैं और पिछले कुछ वर्षों से सर्दियों के मौसम में मानव-वन्यजीव टकराव तेजी से बढ़ा है,उन्होंने इसके दो प्रमुख कारण बताए.
वन्यजीव विशेषज्ञ संजय छिम्वाल ने पहला कारण शीत ऋतु को बताया गया, जो बाघों और गुलदारों का प्रजनन व समागम काल होता है. इस दौरान ये जानवर मानसिक और शारीरिक दबाव में रहते हैं, जिससे उनका मूवमेंट एक स्थान से दूसरे स्थान तक अधिक हो जाता है. दूसरा बड़ा कारण मानवीय दखल है. संजय छिम्वाल के अनुसार सर्दियों में ग्रामीणों की जंगलों पर निर्भरता बढ़ जाती है, जलावन लकड़ी, चारा और अन्य जरूरतों के लिए लोग वनों की ओर जाते हैं. बरसात के बाद इस समय जंगलों में झाड़ियां भी अधिक होती हैं, जिससे इंसान और वन्यजीव के आमने-सामने आने की घटनाएं बढ़ जाती हैं. इसी टकराव में कई बार लोग घायल होते हैं या जान भी चली जाती है.
उन्होंने बताया कि वन विभाग लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है, पोस्टर लगाए जा रहे हैं और लाउडस्पीकर के माध्यम से लोगों से अपील की जा रही है कि वे इस मौसम में जंगलों में न जाएं. बावजूद इसके लोगों को भी अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है. साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि वन विभाग को ऐसे ग्रामीणों के लिए वैकल्पिक रोजगार के साधन विकसित करने होंगे, जो पूरी तरह जंगलों पर निर्भर हैं, ताकि उनकी जरूरतें बाजार से पूरी हो सकें और जंगलों पर दबाव कम हो.
हाल ही में बेकरी प्रोडक्शन और ऐपड बनाने जैसे कार्यक्रम शुरू किए गए हैं. इसके अलावा सीएसआर फंडिंग के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में सिलाई स्कूल खोलने और बड़े स्तर पर मौन पालन कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी है. निदेशक ने कहा कि उद्देश्य यही है कि लोगों की जंगलों पर निर्भरता कम हो,जब निर्भरता घटेगी तो जंगलों में आवाजाही कम होगी और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी दुखद घटनाओं में भी कमी आएगी. उन्होंने लोगों से अपील की कि सर्दियों के मौसम में जंगलों में जाने से बचें, क्योंकि यह जानलेवा साबित हो सकता है.