उत्तराखंड में ना कुमाऊं बचा, ना गढ़वाल… हर पहाड़ी गांव में हालात एक जैसे हैं। बेरोजगारी, पलायन और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने अब एक और सामाजिक संकट को जन्म दे दिया है। पर्वतीय जिलों में रहने वाले युवाओं के सामने अब शादी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। अब ये सिर्फ एक पारिवारिक समस्या नहीं, एक सामाजिक संकट बन चुका है। क्या वाकई उत्तराखंड का पहाड़ अब सिर्फ बुजुर्गों का ठिकाना बन कर रह जाएगा? देखिए रिपोर्ट
हमारी टीम ज़मीनी हकीकत जानने के लिए सीधे लोगों के बीच पहुँची समाज के कुछ अहम वर्गों से बात की, तो सामने आईं कई अनकही सच्चाइयाँ। पहले ज़रा आप भी सुनिए, क्या कह रहे हैं लोग…
एंकर 3 – समाज के कुछ वर्गों की आवाज़ सुनकर आप समझ ही गए होंगे कि ये समस्या कितनी चिंताजनक है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वक्त में ये एक गंभीर रूप ले सकती है। पहले उत्तराखंड का युवा इंडियन आर्मी की ओर भी रुख करता था लेकिन जबसे अग्निवीर योजना आई युवाओं का रुख उस ओर भी कम हो गया। इस अहम मसले पर राजनीतिक प्रतिक्रिया जानने के लिए हमारी टीम कांग्रेस मुख्यालय पहुँची, जहाँ कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता डॉ. प्रतिमा सिंह से बात हुई। उन्होंने क्या कहा, आइए आपको सुनाते हैं।
किसी भी मुद्दे की पूरी तस्वीर जानने के लिए दोनों पक्षों की बात ज़रूरी होती है। इसलिए हमारी टीम भाजपा प्रदेश कार्यालय भी पहुँची, जहाँ भाजपा के प्रदेश महामंत्री आदित्य कोठारी से बातचीत हुई। सुनिए उन्होंने क्या प्रतिक्रिया दी…
हमने समाज के हर तबके की बात सुनी, नेताओं के तर्क भी सुने लेकिन अब असली सवाल यही है। क्या सरकार इन आवाज़ों को सुनकर कोई ठोस कदम उठाएगी?”